पूंजीपतियों की आपसी स्पर्धा के कारण श्रमिक शोषण के नए-नए अध्याय खुल रहे थे.
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बंगाल में श्रमिक शोषण के राज को बदस्तुर चलाने में असचेत और भ्रष्ट अमला अपना योगदान देते रहे हैं।
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उसका उपयोग अब वे श्रमिक शोषण को बनाए रखने के लिए नए-नए रूप में कर रहे हैं.
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उसका उपयोग अब वे श्रमिक शोषण को बनाए रखने के लिए नए-नए रूप में कर रहे हैं.
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श्रमिक शोषण के खिलाफ जब भी कोई आवाज उठती है, सरकार उन्हें माओवादी कहकर राष्ट्रद्रोह की धाराओं में अन्दर करने में भी कोई कसर नहीं करती।
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यूनियन अध्यक्ष जयभगवान ने भी इस मौके पर श्रमिक शोषण को लेकर सरकार की आलोचना की और कहा कि शोषण से छुटकारा पाने के लिये संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है।
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जो एक ऐसी समस्या है जिससे न केवल राजस्व हानि होती है बल्कि खनिज का सही उपयोग न होने से अवैध औद्योगिक विकास एंव श्रमिक शोषण एंव रोजगार हीनता ही बनी रहती है।
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वर्ष 1987 में स्थापित और मुनाफा कमाने वाली होंडा में श्रमिकों के खिलापफ लिया गया फैसला तो है ही, भास्कर और अन्य कंपनियों ने भी श्रमिक शोषण में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है।